संसार में कार्य करते हुए भक्ति कैसे करें

उपरोक्त शीर्षक के संदर्भ में वेद कहता है कि बंधन और मोक्ष का कारण मन की अवस्था अर्थात मनसा या भाव के अनुसार होता है न कि बाह्य इन्द्रियों के कार्य आंख, कान, जिव्हा आदि द्वारा होता है। 

 ‘मन ही मनुष्याणां कारणम बंध मोक्षयो:’

पंचदशी के अनुसार भगवान बाहर की चीज़ों को नहीं देखते हैं , भीतर की चीज़ देखते हैं। इसे कुछ उदाहरणों द्वारा ठीक प्रकार से समझ सकते हैं।जैसे श्री वृन्दावन धाम में मंदिर निर्माण हो रहा है , कारीगर कार्य करता है इस मंशा से कि पैसा मिलेगा और हमारा काम बनेगा, वहीँ एक साधु जो वृन्दावन वास करते हैं, भगवान का मंदिर बनता देखकर सोचते हैं कि हम भी निर्माण कार्य मे सेवा करे। कार्य वही कर रहे हैं, जो कारीगर कर रहा है, किन्तु अंतर मनसा में है। दोनों को अपने मनसा या भाव के अनुसार सांसारिक व भगवद्भक्ति संबंधी फल मिलेगा। संसार में भी हमारे मन की अवस्थानुसार पाप -पुण्य का निश्चय होता है। एक पुलिस अफसर अपनी ड्यूटी के अंतर्गत अपराधी को मारता है, तो उसको पाप नही लगता या सज़ा नहीं मिलती अर्थात जो केवल ड्यूटी करे, समाज भी उसको दंडनीय अपराध नहीं मानता है।उसी प्रकार एक डॉक्टर, अपनी शक्तिनुसार, पूर्ण सावधानी पूर्वक ठीक ठीक मरीज़ का ऑपरेशन करता है, बावजूद इसके यदि मरीज़ की जान चली जाए तो समाज उसे दंड नहीं देता क्योकि उसने अपना कार्य आसक्तिरहित होकर किया है। परंतु भगवान कहते हैं कि हमारे लिए तुम्हें संसार की सम्पूर्ण आसक्ति को मिटाना होगा क्योंकि डॉक्टर भी आखिर अपना पेशा पैसे के लिए कर रहा है। भगवान का कहना है कि तुम्हारी संसार में कहीं भी आसक्ति न हो, संसार में जो भी कर्म करो, हमारी सेवा समझ कर करो। आसक्ति तो मन का विषय है और मन को ही भगवान में लगाना है। भगवान हमारे मन को देखते हैं, क्रिया को नहीं देखते हैं। इसे इस तरह समझे। रामकृष्ण परमहंस से एक महिला ने कहा, मैं वृन्दावन वास  करना  चाहती हूं । रामकृष्ण परमहंस ने कहा, तुम्हारी आसक्ति तो अपने बेटे में है, तुम रहोगी वृन्दावन में और चिंतन बेटे का होगा । इससे अच्छा होगा कि तुम जँहा हो वहीँ  रहो और चिंतन वृन्दावन का करो। तो हम कहाँ रहते हैं क्या करते हैं, भगवान इसे नहीं देखते, वो तो सिर्फ मन की स्थिति को देखते हैं। कर्मयोगी सदना कसाई के कार्य को भगवान ने नहीं देखा उनके मन के भावों को देखा। जैसे मंदिर में आरती हो रही है, पंडितजी हाथों में आरती की थाली लिए मन ही मन सोच रहे हैं कि आरती में चढ़ौत्री कितनी आएगी? भगवान ये आरती नहीं स्वीकारेंगे, आरती तब मानी जायेगी जब मन का लगाव श्रीविग्रह के चरणों में होगा । 

इसे यूं समझें, अगर कोई विरोधी पार्टी के नेताजी आएं और आपने विवश हो कर उनको बढ़िया गुलाब की माला पहनाई परन्तु मन में सोच रहे हैं कि काश मैं इसे जूतों की माला पहनाता। भगवान फूलों की माला के बजाय जूतों की माला पहनाई, ऐसा नोट करेंगे। तो अध्यात्म में हमको अंदर घुसना है। बाहर से हम कितने ही तिलक लगा लें,  भगवा वस्त्र पहन लें, काम नहीं बनेगा। 

मनुष्य बाहर की चीज़ देखता है, भगवान अंदर की चीज़ देखते हैं। अगर मन संसार में बंधा रहा और शरीर से अध्यात्म हो तो यह वही बात होगी जिस प्रकार मथुरा के कुछ चौबे भांग के नशे में नौका की शृंखला को खूँटे में बंधे बंधे ही सारी रात नौका खेते रहे और समझे कि हम प्रयागराज पहुंच गए हैं। लेकिन होश आने पर पता चला कि हम तो वहीं के वहीं हैं। क्योंकि नौका को तो खोला ही नही था। ठीक इसी प्रकार हमारा मन सांसारिक विषयों में आसक्त रहें और शरीर से आध्यत्मिक साधना करते रहें, तो अनंत जन्मों की ऐसी साधना के बाद भी हम स्वयं को संसार में ही पायेंगें क्योकि भगवान का अकाट्य सिद्धांत है, जहाँ मन की आसक्ति होगी, उसी तत्व की प्राप्ति होगी। तो हमें ये भलीभांति समझना होगा कि एक मन है, उसे संसार से विरक्त करके, संसारी आसक्ति को समाप्त करके भगवान में अनुरक्त करना है।

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